लोकप्रिय और ट्रेंडिंग टॉपिक्स

विज्ञापन
Hindi News ›   India News ›   Article test 82: abc

Article test 82: abc

Robin Kumar Robin Kumar
Updated Thu, 08 Sep 2022 02:27 PM IST
सार

जिस बेकाबू ट्रक की वजह से यह हादसा हुआ, उसमें राख लदी हुई थी। ट के ढेर में तब्दीलजिस बेकाबू ट्रक की वजह से यह हादसा हुआ, उसमें राख लदी हुई थी। ट्रक के पलटते ही पूरी कार राख

accident on bharmour pathankot NH
accident on bharmour pathankot NH - फोटो : अमर उजाला

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

विस्तार

इस बार नगर निगम चुनावों ने डालडा की यादें लपक ताजा कर दी हें। भोपाल नगर निगम चुनाव की मू्ल्य सूची अभी जारी नई हुई हेगी पर इंदोर जिला पिरशासन ने इस दफे डालडा के लड्डू की कीमत भी ते कर दी हे। मतलब ये के अगर कोई चुनाव पिरत्याशी वोटरों को डालडा के लड्डू बांटता पाया गया तो उत्ता पेसा पिरत्याशी के चुनाव खर्च में जुड़ जाएगा। कुल खर्च ज्यादा हुआ तो पिरत्याशी का चुनाव रद्द। वहां पिरशासन ने डालडा के एक लड्डू की कीमत ढाई सो रूपे किलो ते की हे। लड्डू अगर असली घी का हुआ तो ये कीमत दो गुनी यानी के पांच सो रू. किलो होगी। लुब्बो लुआब ये के खां, वोटरों को पटाने वास्ते लडडू बांटना भी खतरे से खाली नई हे। 


मियां, इंदोर तो ठीक अपने भोपाल का डालडा से भोत करीब का रिश्ता रिया हेगा। वजह ये कि ये वो आइटम हे जिसे गरीब का घी समझ के लोग खाते रिए हें। डालडा की मकबूलियत का आलम ये रिया कि अगर किड़ींगकांग या जोर करने में कोई उन्नीसा मिला तो केते थे के खां डालडा खा के बड़ा हुआ हे क्या? गुजरे जमाने में असली घी हर किसी को नसीब नई था। लिहाजा कुआं खोद के पानी पीने वाले या तो तेल में खाना अोर पकवान बनाते थे या फिर डालडा में। डालडा को  हिंदी में वनस्पति घी केते हें, मगर लोगों की जबान पे डालडा ई चढ़ा हुआ हे। डालडा केते ई लोग समझ जाते थे माल दो नंबर के घी में बना हे। डालडा इस मुल्क में अंगरेज लाए थे। ये तो तेल को इस कमाल से जमाने का कीमियागरी थी किे वो दिखता घी की माफिक ओर लज्जत में तेल में तेल पे भारी पड़ता था। शुरू में इसका नाम कासिम डाडा था। बाद में कंपनी ने अपने नाम का ‘एल’ हर्फ भी बीच में फंसा दिया तो नाम पड़ा डालडा। पीले रंग के डिब्बों पर हरे खजूर का पेड़ इसकी खास पेचान थी। गरीब की जेब के माफिक होने से जल्द ई जश्न जलसों में आइटम डालडा में बनने लगे। तिकड़मी भोपालियों ने तो इसका दूसरा इस्तेमाल खोज निकाला। डालडा के टीन के बड़े चोकोर डब्बों का इस्तेमाल पानी भरने के लिए होने लगा। पेले माल चरो फिर उसमें पानी भरो। आम के आम और गुठलियों के दाम। गरीबों और कम आमदनी वालों के रसोई घरों में डालडा के डब्बे अमूमन दिखाई पड़ते थे। हलुआ पूरी ओर तमाम मिठाइयां उसी में बनती थी ये सोचकर के मियां घी का तर माल खा रिए हें। भोपाल के सिन्धियों में तो पराठे खुसूसन डालडा में बनते थे। 


मियां, वक्त वक्त की बात हे। जेसे भोपाल के पटिए उखड़े वेसे ई डालडा को रिफाइंड आॅइल की नजर लग गई। बाजार के आकाअोंने लोगों को समझाया के डालडा गला पकड़ता हे या फिर इससे इंसान मोटा होने लगता हे, लिहाजा रिफाइंड ऑइल खाओ। माहोल ऐसा बना के लोग धीरे धीरे मेंगा रिफाइंड तेल खाने लगे। डालडा के खजूर का पेड़ खुद गुमनामी के रेगिस्तान में गुम हो गया। मगर डालडा ने करीब चालीस सालो तक इस मुल्क पर जो राज करा, उसकी दूसरी मिसाल मुश्किल हे। डालडा तो हमारी जबान में भी शामिल हो गया। कहावत बनी के ‘दिल लगा डालडा से तो घी की क्या कदर?’ 
 

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है। खबरों को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।

खबर में दी गई जानकारी और सूचना से आप संतुष्ट हैं?
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News apps, iOS Hindi News apps और Amarujala Hindi News apps अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads
    News Stand

Follow Us

  • Facebook Page
  • Twitter Page
  • Youtube Page
  • Instagram Page
  • Telegram
एप में पढ़ें
जानिए अपना दैनिक राशिफल बेहतर अनुभव के साथ सिर्फ अमर उजाला एप पर
अभी नहीं

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
डेली पॉडकास्ट सुनने के लिए सब्सक्राइब करें

क्लिप सुनें

00:00
00:00